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केंद्र सरकार ने बताया है कि वह पेगासस मामले की जांच के लिए एक विशेषज्ञ कमिटी बनाएगा. सुप्रीम कोर्ट में दाखिल जवाब में केंद्र ने जासूसी के आरोपों को बेबुनियाद बताया है. लेकिन साथ ही यह भी कहा है कि वह सभी आशंकाओं को दूर करने के लिए निष्पक्ष विशेषज्ञों की एक कमिटी बनाने को तैयार है. केंद्र ने यह प्रस्ताव भी दिया है कि कमिटी किन-किन मुद्दों पर काम करेगी, यह सुप्रीम कोर्ट ही तय कर दे.

पत्रकारों, सामाजिक कार्यकर्ताओं, जजों समेत दूसरे लोगों की जासूसी करवाने के आरोप का आज केंद्र सरकार ने जोरदार खंडन किया. सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय की तरफ से दाखिल हलफनामे में कोर्ट को यह बताया गया कि मामले में याचिका दाखिल करने वाले सभी लोगों ने कही-सुनी बातों के आधार पर याचिका दाखिल कर दी है. केंद्र की तरफ से जिरह करते हुए सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा, “संसद का सत्र शुरू होने से पहले एक वेब पोर्टल ने सनसनी फैलाने के मकसद से इस तरह की खबर प्रकाशित की. बाद में विपक्ष ने उस पर हंगामा खड़ा कर दिया. जबकि इन आरोपों का असल में कोई आधार नहीं है.”

तुषार मेहता ने चीफ जस्टिस एन वी रमना, जस्टिस सूर्यकांत और अनिरुद्ध बोस की बेंच से कहा, “संसद में सूचना प्रौद्योगिकी मंत्री स्पष्ट बयान दे चुके हैं. ऐसी कोई जासूसी नहीं हुई है. पेगासस को बनाने वाले वाले एनएसओ ग्रुप ने भी कहा है कि उसने भारत में अपना स्पाइवेयर नहीं बेचा. उसके ग्राहक मुख्य रूप से पश्चिमी देशों में हैं. ऐसे में यह समझना मुश्किल है कि याचिकाकर्ता क्या चाहते हैं.”

मेहता ने आगे कहा, “फिर भी सरकार अपनी अच्छी मंशा का परिचय देते हुए निष्पक्ष तकनीकी विशेषज्ञों की एक कमिटी बनाना चाहती है. अगर लोगों को सच जानने की इच्छा है, तो यह एक उचित कदम है. लेकिन अगर मकसद सिर्फ सनसनी फैलाना है, तो फिर कुछ नहीं किया जा सकता.”

याचिकाकर्ताओं की तरफ से वरिष्ठ वकीलों कपिल सिब्बल, श्याम दीवान, राकेश द्विवेदी, दिनेश त्रिवेदी और मीनाक्षी अरोड़ा ने सरकार के हलफनामे को नाकाफी बताया. मुख्य दलीलें सिब्बल ने रखीं.

उन्होंने कहा, “सरकार को स्पष्ट रूप से बताना था कि उसने पेगासस स्पाइवेयर खरीदा या नहीं? उसका इस्तेमाल किया या नहीं? यह बात शपथ पत्र पर लिख कर देने के बजाय सरकार ने सिर्फ आरोपों का खंडन कर दिया है. 2019 में सरकार ने खुद माना था कि पेगासस के चलते भारत के कुछ व्हाट्सऐप यूजर्स की निजता प्रभावित होने की आशंका है. आज याचिकाओं को ही बेबुनियाद कैसे कह सकते हैं? सभी बातों को विस्तार से बताने की बजाय सिर्फ 2 पन्ने का जवाब दाखिल कर दिया गया है. कोर्ट सरकार को विस्तृत जवाब दाखिल करने को कहे.”

इस पर कोर्ट ने सॉलिसीटर जनरल से पूछा कि क्या वह विस्तृत जवाब दाखिल करना चाहेंगे. मेहता ने जवाब दिया कि बहुत ज़्यादा विस्तार में जाने से राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े कुछ संवेदनशील पहलुओं पर बात करनी पड़ सकती है. समस्या यह है कि अगर सरकार यह लिख कर दे कि उसने न तो पेगासस खरीदा, न इस्तेमाल किया; तब भी याचिकाकर्ता इसे स्वीकार नहीं करेंगे. इसलिए, बेहतर हो कि विशेषज्ञों की कमिटी बनाने दी जाए.

याचिकाकर्ताओं ने सरकार की तरफ से कमिटी बनाने का विरोध किया. उन्होंने कहा कि जब आरोप सरकार पर ही हों तो उसे ही जांच का ज़िम्मा कैसे सौंप सकते हैं. वरिष्ठ वकील राकेश द्विवेदी ने कहा, “अगर कोई कमिटी बननी भी है तो वह सरकार की बजाए कोर्ट को रिपोर्ट दे. कमिटी में निष्पक्ष लोगों को रखा जाए.”

By Newzzar

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