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द वॉशिंगटन पोस्ट ने दुनियाभर के 16 अन्य मीडिया सहयोगियों के साथ मिलकर ‘द पेगासस प्रोजेक्ट’ नाम से जांच रिपोर्ट जारी की है. इस जांच रिपोर्ट में दावा किया गया है कि प्राइवेट इज़राइली सॉफ्टवेयर पेगासस का इस्तेमाल फोन टैप करने में किया गया. इसमें दुनियाभर के 37 स्मार्टफोन को हैक करने में कामयाबी भी मिली. ये स्मार्टफोन बड़े पत्रकार, मानवाधिकार कार्यकर्ता, व्यापारी अधिकारी और दो ऐसी महिलाओं जो कि सऊदी अरब के पत्रकार जमाल खसोगी की हत्या से जुड़ी थीं, उनके थे.

दरअसल इस मिलिट्री ग्रेड स्पाइवेयर को आतंकियों और अपराधियों को ट्रैक करने के लिए इस्तेमाल का लाइसेंस मिला हुआ है, लेकिन इसके ज़रिए 37 स्मार्टफोन को कामयाबी के साथ हैक किया गया. लिस्ट में 50 हज़ार से ज्यादा फोन नंबर मौजूद थे. जांच में दावा किया गया है कि जो देश अपने नागरिकों की जासूसी के लिए जाने जाते हैं वो इज़राइली फर्म एनएसओ ग्रुप के क्लाइंट भी हैं. एनएसओ ग्रुप दुनिया की स्पाइवेयर इंडस्ट्री की वर्ल्डवाइड लीडर है.

भारत में 300 लोगों की हुई जासूस

न्यूज़ वेबसाइट द वायर के मुताबिक भारत करीब 300 लोगों की जासूसी पेगासस के स्पाइवेयर के ज़रिए की गई, जिसमें 40 पत्रकार भी शामिल हैं. जिनके फोन हैक करने का दावा किया गया है उनमें मंत्री से लेकर विपक्ष के नेता, पत्रकार, लीगल कम्युनिटी, कारोबारी, सरकारी अफसर, वैज्ञानिक और एक्टिविस्ट्स तक शामिल हैं. दावा है कि इन लोगों पर फोन के ज़रिए निगरानी रखी जा रही थी. हालांकि केंद्र सरकार ने इस रिपोर्ट का खंडन कर दिया है.

भारत के कई मीडिया संस्थानों के पत्रकारों की जासूसी का दावा

इस जांच रिपोर्ट में दावा किया गया है कि पेगासस स्पाइवेयर के ज़रिए इंडियन एक्सप्रेस, हिंदुस्तान टाइम्स, न्यूज़ 18, इंडिया टुडे, द हिंदू, द वायर और द पायनियर जैसे मीडिया संस्थानों से जुड़े पत्रकारों को निशाना बनाया गया था. दावा है कि एक भारतीय एजेंसी ने साल 2017 से लेकर 2019 के बीच इन सस्थानों में काम करने वाले पत्रकारों की निगरानी के लिए इनके फोन को टैप किया था.

भारत सरकार ने जांच रिपोर्ट का किया खंडन

भारत सरकार ने इस मामले पर कहा है कि सरकार पर कुछ लोगों की जासूसी का जो आरोप लगाया गया है उसका कोई मज़बूत आधार नहीं है और न ही इसमें कोई सच्चाई है. बयान में कहा गया है कि इससे पहले भी इस तरह का दावा किया गया था, जिसमें वाट्सएप के ज़रिए पेगासस के इस्तेमाल की बात कही गई थी. वो रिपोर्ट भी तथ्यों पर आधारित नहीं थी और सभी पार्टियों ने दावों को खारिज किया था. वाट्सएप ने तो सुप्रीम कोर्ट में भी इन आरोपों से इनकार कर दिया था.

बयान में कहा गया है कि आईटी मंत्री ने इस पर विस्तार से बात की थी. संसद में भी उन्होंने बयान दिया था कि अनधिकृत तरीके से सरकारी एजेंसी द्वारा किसी तरह की कोई टैपिंग नहीं की गई है. इंटरसेप्शन के लिए सरकारी एजेंसी प्रोटोकॉल के तहत ही काम करती है. टैपिंग का काम किसी बड़ी वजह और राष्ट्रीय सुरक्षा के मद्देनज़र ही किया जाता है. ये खबर भारतीय लोकतंत्र और इसके संस्थानों को बदनाम करने के अनुमानों और अतिश्योक्ति पर आधारित है. सरकार ने अपने जवाब में साफ़ किया है कि छापी गयी रिपोर्ट बोगस है और पूर्वाग्रह से ग्रसित होकर तथ्यहीन रिपोर्ट छापी गई है.

By Newzzar

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